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इतिहास, संस्कृति और आर्ष ग्रंथों पर शोध एवं वेदों का प्रचार—प्रसार

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वैदिक धर्म इस जगत का सबसे प्राचीन धर्म है, वास्तव में धर्म तो वैदिक ही है, बाकी अन्य तो मत—मतांतर ही हैं। जहां सभी मत—मतांतरण संकीर्ण विचारों से बंधे हैं, वहीं वैदिक धर्म अत्यन्त वैज्ञानिक, सुव्यवस्थित एवं सुरक्षित मानव जीवन की पद्धति को बतानेवाला है। यह वैदिक धर्म परमात्मा द्वारा मनुष्य को मिले वेदज्ञान पर आधारित है। इसलिए वैदिक धर्म की रक्षा भी वेदों से जुड़ी हुई है।

कभी सारी दुनिया में आर्यो का चक्रवर्ती राज्य हुआ करता था, लेकिन कालांतर में आर्यो का राज्य उनके मूल स्थान से भी लुप्तप्राय: हो गया और विदेशियों के आक्रमणों से तथा अनेक राजनैतिक एवं सामाजिक कारणों से इस धर्म का स्वरूप ही बदल गया है। धर्माचरण, एकेश्वरोपासना, सत्यान्वेषण, निराडम्बर जीवन पद्धति के स्थान पर अधर्माचरण, विविध जड़पूजा, हिंसा, अन्धविश्वास, आडम्बर एवं अमानवीय जीवन पद्धतियों से वैदिक धर्म (हिन्दुत्व) अनेक भागों में बंटकर विनाश की स्थिति में पहुंच गया है।

जिस देश में वंदेमातरम गान के लिए विरोध हो, उससे बुरी दुर्दशा अपनी संस्कृति की और भला क्या होगी, यहां तो भारतीय अपने इतिहास और संस्कृति को पूरी तरह भूल चुके हैं। अशान्ति, अज्ञान, अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार आदि से विनाश की ओर जाती हुई इस मानव-जाति को बचाकर शान्ति प्रदान करनेवाला एक ही उपाय है – वैदिक-धर्म का पुनरुज्जीवन। इस वैदिक-पद्धति से जीवन बिताना और अपने इतिहास और संस्कृति को जानकर पूर्वजों जैसा गौरव संसार में पुन: हासिल करना ही सभी समस्याओं का समाधान है।

हम भारतवर्ष की संतान हैं। हमारे पूर्वजों के कार्यकलापों के कारण ही हमारे इतिहास का निर्माण हुआ है। जब इतिहास को हमारे पूर्वजों ने निर्मित किया है तो अपना इतिहास लिखने का अधिकार हमको ही है, न कि विदेशी विद्वानों को। इसलिए हमने राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से भारतीय इतिहास, वैदिक संस्कृति और आर्ष ग्रंथों पर अनुसंधान और पुस्तक लेखन, प्रकाशन एवं सस्ते दामों में वितरण का बीड़ा उठाया है।

नष्टे मूले नैव फलं न पुष्पम्

जिस देश की सभ्यता एवं संस्कृति को मिटाना हो तो उस देश का इतिहास मिटा दो। स्मारक, साहित्य तथा वास्तविक संपत्ति चरित्र को मिटा दो। संसार के नक्शे से फिर वह देश स्वतः ही मिट जाएगा। अश्लील साहित्य की सार्वजनिक स्थानों पर बिक्री की खुली छूट, चित्रहार, गंदी फिल्में, गान्धर्व, पैशाच, राक्षस आदि म्लेच्छ विवाह की जिस राष्ट्र में खुली छूट हो, उस देश की सभ्यता व संस्कृति स्वतः नष्ट हो जाएगी। इसी तरह विदेशी जनों पाश्चात्यता के गुलाम भारतीयों ने भारतवर्ष का नाश करने के लिए, भारत के स्वाभिमान व सभ्यता संस्कृति को नष्ट करने के लिए निम्न उपाय निकाल डाले : आर्यों का आदि देश मध्य एशिया मानकर, भारत को अनेक देशों का उपमहाद्वीप मानकर, वास्को-डि-गामा के आगमन से भारत के इतिहास का श्रीगणेश करके, जैसे कि उसके पहले भारत कहीं खो गया था, जो उसे खोज निकाला ? मिथ्या वेद भाष्य करके जैसे राष्ट्रीय अनुसंधान प्रशिक्षण परिषद् की प्राचीन भारत नामक पुस्तक में है :-

1. आर्यों का जीवन स्थायी नहीं था।

2. ऋग्वेद के दस्यु संभवतः इस देश के मूल निवासी थे।

3. हड़प्पा संस्कृति का विध्वंस आर्यों ने किया।

4. अथर्ववेद में भूत प्रेतों के लिए ताबीज।

5. पशुबलि के कारण बैल उपलब्ध नहीं।

भला इन षड्यंत्रों से भारत को कब तक बचा पायेंगे? राष्ट्रीय स्वदेशाभिमान, स्वाभिमान, भारतीय सभ्यता-संस्कृति को कैसे सुरक्षित रखा जा सकेगा?

वैदिक संगम मिशन को चलाने वाली श्रीमती फरहाना ताज न तो जन्म से हिन्दू है और न ही किसी भी आर्ष गुरुकुल या विश्वविद्यालय से इतिहास या धार्मिक विषय की स्नातक है, न ही इसने इतिहास या धार्मिक विषयों में विशेष योग्यता ही प्राप्त की है, किन्तु सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने बाद भारतीय सभ्यता संस्कृति के प्रति इनकी विशेष रुचि व अनुराग रहा है और इनकी यह इच्छा तब से ही थी कि धर्म, संस्कृति, इतिहास जैसे महत्त्वपूर्ण विषय के पठन-पाठन के क्रम में शोधपूर्ण प्रामाणिक परिवर्तन अवश्य किये जायें। वे मानती हैं कि

विदेशियों ने हमारे इतिहास को मोम का पुतला बना दिया है। जिधर चाहते हैं खींच ले जाते हैं। पश्चिमी इतिहासविदों और विद्वानों यथा म्योर, एलफिंस्टन, मनसियर डेल्बो, पोकाक, विलियम कार्नेट डा. जार्ज पोलेस, डेल्स एवं एलिजाबेथ राल्स आदि ने भी यह रहस्योद्धाटन किया है कि मार्टिन व्हीलर, स्टुअर्ट पिगट और जान मार्शल जैसे विद्वानों ने भी तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा है। अतः शोधर्पूर्ण गंभीरता से तर्कपूर्वक अपने इतिहास, धर्म और संस्कृति पर विचार करना हम सभी भारतवासियों का श्रेष्ठ कर्त्तव्य है, ताकि हमारी सभ्यता एवं संस्कृति इस तामसी विचारों वाले संसार में, जो कीचड़ से भी बद्तर है, में कमल की भांति खिल उठे। इतिहास, संस्कृति और आर्ष ग्रंथों पर शोध एवं साहित्य प्रकाशन के अलावा हमारी अन्य गतिविधियां हैं :

1. दुनिया की विविध भाषाओं में वेदों का प्रकाशन

2. सत्यार्थ प्रकाश का अधिक से अधिक भाषाओं में प्रकाशन

3. सोशल मीडिया पर विदेशियों को उन्हीं की भाषा में वैदिक सिद्धांतों की ओर आकर्षित करना

4. इतिहास, कला, संस्कृति पर शोधपरक, सरल एवं सुरुचिपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित करके उन्हें अल्प मूल्य में बेचना

5. गुरुकुल, अनाथालयों की स्थापना में सहयोग देना एवं मृतप्राय: हो चुके गुरुकुलों को नवजीवन प्रदान करने का प्रयास करना।

समय के अभाव और सीमित साधन होते हुए भी हम अपने लक्ष्य की ओर निरंतर अग्रसर हैं…आप चाहते हैं कि यदि अपना यह देश पुन: विश्वगुरु की पदवी प्राप्त हो, तो आपको हमारे कार्य में सहयोगी बनना होता। आप इस कार्य के लिए हमारी पुस्तकों के कवर के बैक पर अपने संस्थान का विज्ञापन देकर या फिर पुस्तक अल्प मूल्य रखने के लिए आर्थिक सहयोग देकर पुण्य के भागी बन सकते हैं। दिया गया दान कभी व्यर्थ नहीं जाता…

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